Thursday, June 14, 2012

ऐसी ही ये दुनिया है, तो ये दुनिया क्यूँ है?



ज़िन्दगी जीने के लिए, मौत समझना पड़े.
ऐसी ये हालत क्यूँ है?
मोहब्बत समझने के लिए, चोट खानी पड़े.
ऐसी ये कहावत क्यूँ है?
अमन से जीने के लिए, जंग लड़नी पड़े.
ऐसी ये प्रथा क्यूँ है?
सच कहने पर, हलक गवानी पड़े.
ऐसी ये दहशत क्यूँ है?
थक गए नैसर्गिक अधिकार के लिए लड़ते लड़ते
अगर ऐसी ही ये दुनिया है, तो ये दुनिया क्यूँ है?

- साहिल 

Monday, May 21, 2012

तबस्सुम दबाने की कोशिश अधूरी है!



आज ख़फा होने की कोशिश पूरी है
तबस्सुम दबाने की कोशिश अधूरी है

कुर्बते बीच बनानी आज थोड़ी दूरी है
नज़रो से ग़ाज गिराने भी जरुरी है

अदाओ से होगा कत्ले-आम आज
थोडा घबराना मेरा भी ज़रूरी है

हम तो कब के मघ्लूब हुए बैठे है साहिल
अब बस उनके एक मुस्कुराने की देरी है

- साहिल 

Sunday, May 13, 2012

कुछ ऐसे हो मेरे करम!



अच्छे रहे होंगे, ऐसे कुछ मेरे करम
जो तेरी कोख से, हुआ मेरा जनम

रहबर बन हमेशा, सवारे मेरे करम
करुना ममता ने धोये मेरे सारे ग़म

खुदा हो तुम मेरे, नहीं है ये मेरा भरम
जख्म भर जाए, स्पर्श तुम्हारा एक मरहम

मिलो हर जनम में, बनकर मेरी माँ
अब बस दुआ है इतनी, कुछ ऐसे हो मेरे करम

- साहिल 

Tuesday, April 10, 2012

खूबसूरत है वोह पल कितना...



खूबसूरत है वोह पल कितना
दरिया में है जल जितना
याद तुझको कर रहा हूँ
हँसते हँसते बढ़ रहा हूँ

खूबसूरत है वोह पल कितना
दरिया में है जल जितना

आ गया हूँ मैं दूर इतना
दरिया से सागर जितना
कहकशां में खो गया हूँ
हँसते हँसते बढ़ रहा हूँ

खूबसूरत था वोह पल कितना
दरिया में है जल जितना....

- साहिल 

Wednesday, March 7, 2012

बुरा न मानो होली है!



कही हंसी कही ठहाके,
घूम रही लडको की टोली रे
कही उडी अबीर गुलाल
कही बटी भांग की गोली रे

मिटा गिले, मिले गले
खेले ऐसी होली रे
दूरियों को अपनों से दूर हटा
कहे प्यार की दो बोली रे

श्वेत श्याम से जीवन में
भर ले आशाओं की झोली रे
करले जो है आज तेरे दिल में
और कह दे ,बुरा न मानो होली है!

- साहिल 

Monday, February 6, 2012

ये शहर भी कितना अजीब है!



ये शहर भी कितना अजीब है,
कोई कातिल तो कोई बकील है.

मेरा नाम यहाँ कही खो गया,
मेरा अक्स ही मेरे करीब है.

मैं किससे अपना दुखड़ा कहू,
दूर मुझसे मेरा रकीब है.

तू जो पास हो तो है सुकून,
तेरी छाव में मेरा नसीब है.

न भूला सका जो चला गया,
किस्से फ़िक्र है जो करीब है.

यहाँ कौन है किससे मशवरा करू,
सब जान कर भी यहाँ सब अनभिज्ञ है.

- साहिल 

Friday, December 23, 2011

ये दुनिया?



सिक्को की खनखनाहट से गूँज रही ये दुनिया
अमीरों के होते हुए भी कैसी गरीब है ये दुनिया
हमसे तो अच्छे वोह गरीब है इस दुनिया में
दो वक़्त की रोटी से रोशन है जिनकी दुनिया

हर वक़्त रिश्तों को पैसे में तौलती है ये दुनिया
तराजू के दोनों पालों में कैसी उलझी है ये दुनिया
व्यापार है या जीवन, इस असमंजस में फसी है ये दुनिया
हर पल चीजों का मोल लगाने में लगी है ये दुनिया

इंसान पिघला कर पत्थर बनाती ये दुनिया
९९ के फेर में ऐसी मदमस्त है ये दुनिया
कुछ ऐसा कर जाना है की फिर न भूले ये दुनिया
इतिहास के पन्ने लिखने में कुछ तल्लीन सी है ये दुनिया

- साहिल